वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज के प्रवचन देश-विदेश में करोड़ों लोग सुनते हैं। अपने एक हालिया प्रवचन में महाराज ने साधकों और गृहस्थों, दोनों को जीवन की कठिनाइयों से जूझने का सरल मंत्र दिया। उन्होंने कहा कि भगवान की भक्ति करना और उस मार्ग पर अडिग रहना, ये दो अलग बातें हैं, और अडिग रहने के लिए धैर्य और संयम सबसे जरूरी है।
संकट में भी न छूटे नाम स्मरण
महाराज ने कहा कि संकट चाहे कितना भी बड़ा हो, ईश्वर का स्मरण कभी नहीं छोड़ना चाहिए। सुख हो या दुख, मान मिले या अपमान, नाम जप चलता रहना चाहिए। कठिन समय में अधीर होने की बजाय भगवान से सहन करने की शक्ति मांगनी चाहिए। उन्होंने सलाह दी कि अपना निजी दुख हर किसी के सामने न रखें, क्योंकि हर कोई उसे समझे यह जरूरी नहीं, कोई मजाक भी उड़ा सकता है। दुख भगवान के सामने रखें।
क्षमा और द्वेष से दूरी
प्रवचन में महाराज ने क्षमा को भक्ति का अहम अंग बताया। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति गलत व्यवहार के बाद सच्चे मन से शरण में आए, उसे माफ कर देना चाहिए। किसी के प्रति मन में वैर रखना ठीक नहीं, क्योंकि हर व्यक्ति को अपने कर्मों का फल मिलता ही है। दूसरों के कर्मों से परेशान होने के बजाय सहनशीलता, सेवा और परोपकार का भाव रखना चाहिए।
वाणी, समय और कमाई पर सीख
महाराज ने वाणी के संयम पर जोर देते हुए कहा कि बोली ऐसी हो कि सुनने वाले को शांति मिले। गुस्से में भी अपशब्द न बोलें। किसी की कमी दूसरों के सामने उजागर करना चुगली जैसा है, कमी हो तो उसे अकेले में समझाएं। उन्होंने कहा कि जीवन का हर पल कीमती है, इसे बेकार की बातों में न गंवाएं। रिश्वत, चोरी या कपट से कमाया धन आध्यात्मिक यात्रा में सबसे बड़ी बाधा बनता है, इसलिए कमाई धर्म के रास्ते पर ही होनी चाहिए।
- नाम स्मरण: हर हाल में जारी रखें
- क्षमा: शरण में आए को माफ करें
- वाणी: क्रोध में भी संयम
- कमाई: ईमानदारी से, धर्म के मार्ग पर
- भोजन: हल्का और सात्विक
भोजन के बारे में उन्होंने कहा कि हल्का और सात्विक आहार लें, क्योंकि आहार का सीधा असर मन और साधना पर पड़ता है। साथ ही अपनी साधना का कभी अहंकार न करें, क्योंकि सब कुछ ईश्वर की कृपा से ही संभव है।